आशिक़ की थी आखिरी-आह....

जीवन के पदचिन्ह आशिक़ की थी आखिरी-आह, नतीजा ज़माना-ए-बेइंसाफ कीसबको दे गया था वह दुआएं  बस शिकायत अपने खिलाफ की हुआ क़त्ल चुपचाप पर  कह न सका बेवफाई यार कीरहा सोचता शब-ए-क़यामत को होगी बात इंसाफ... [पूरी पोस्ट]
writer Sudhir (सुधीर)

ग़ज़ल

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[23 Mar 2010 14:00 PM]

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