रास्ता ही
रास्ता हीरास्ता ही भूल जाओ एक दिनआओ मेरे घर भी आओ एक दिन बासी रोटी से ज़रा आगे बढ़ोउसको टॉफ़ी भी खिलाओ एक दिन क्या मिलेगा ऐसे गुमसुम बैठ कर,साथ मेरे गुनगुनाओ एक दिन बर्फ़ सम्बन्धों की पिघलेगी ज़रूरधूप जैसे मुस्कराओ एक दिन घर के सन्नाटे में गुम हो...
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Dr. Amar Jyoti
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[23 Mar 2010 11:22 AM]



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