तुम चले गए....

Tamanna तुम्हारी महानता या सब आँचल में समेट लेना था उसका स्वाभाव कितने ही ग्रन्थ भरे पड़े हैं धरा की प्रशंसा से कहीं कहीं तुम पर भी बरसी है उदारता पर मर्म तो अब भी है अनछुआ हर मांग को, हर बात को स्वीकरोक्ति देते थे तुम ही कठोर चेहरे और सख्त जुमलो के साथ दिन भर... [पूरी पोस्ट]
writer Sonalika
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[23 Mar 2010 05:57 AM]

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