टुकड़ा-टुकड़ा यथार्थ

कस्बे का कवि... कितना उबाऊ, नीरस, बेजानऔर बदबूदार हो गया हैसब-कुछजीवन के हर सुंदर दृश्य मेंघुस आया हैखजिया कुत्तों का एक झुंडदुम दबा कर भाग रही हैंअन्तर-आत्माएँशांति की तलाश में-फेशियल करानेनिकला है सौंदर्य बोधथ्रेडिंग के इंतज़ार मेंबैठी है आत्मामंच पर इठलाती... [पूरी पोस्ट]
writer मणिमोहन
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[23 Mar 2010 00:32 AM]

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