वो जुस्तजू, वो मोड़, वो जंगल नहीं रहा

Firdaus's Diary जूड़े में फूल आंखों में काजल नहीं रहामुझसा कोई भी आपका पागल नहीं रहाताज़ा हवाओं ने मेरी ज़ुल्फ़ें तराश दींशानों पे झूमता था वो बादल नहीं रहामुट्ठी में क़ैद करने को जुगनू कहां से लाऊंनज़दीक-ओ-दूर कोई भी जंगल नहीं रहादीमक ने चुपके-चुपके वो अल्बम ही चाट ली महफूज़... [पूरी पोस्ट]
writer फ़िरदौस ख़ान

ग़ज़ल

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[23 Mar 2010 00:18 AM]

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