तुम्हे कैसे याद करुँ भगत सिंह

समकालीन जनमत -अशोक कुमार पाण्डेय जिन खेतों में तुमने बोई थी बंदूकेंउनमे उगी हैं नीली पड़ चुकी लाशें जिन कारखानों में उगता थातुम्हारी उम्मीद का लाल सूरजवहां दिन को रोशनी रात के अंधेरों से मिलती है ज़िन्दगी से ऐसी थी तुम्हारी मोहब्बतकि कांपी तक नही जबानसू ऐ दार पर... [पूरी पोस्ट]
writer समकालीन जनमत
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[22 Mar 2010 23:24 PM]

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