जला है कोई और मैं आग लगाने लगा हूँ

उधेड़-बुन जला है कोई और मैं आग लगाने लगा हूँमरा है कोई और मैं गीत सुनाने लगा हूँकवि हूँ कवि का धर्म निभाऊँगा ज़रूरदुनिया के ग़म को भुनाने लगा हूँऐसा नहीं कि पहले लड़ाई-झगड़े होते नहीं थेअब हर रंजिश को जामा नया पहनाने लगा हूँये कौम कौम नहीं, है दुश्मन हमारीकह कह के... [पूरी पोस्ट]
writer Rahul Upadhyaya

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[22 Mar 2010 19:51 PM]

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