मेरे इश्क की तासीर यही है
अक्सरप्रीत की मदालस गंध के बीचआ जाती है बेपरावह सीरिश्तों की कतरनें जो बिखेरदीं गईं हैं जान बूझकर शायद इस लिये भी की बना रहे अनुशासन तुम मुझे प्रीत थी है और रहेगी बस तुम्हारा इंतज़ार करता रहूँगा हाँ, मैं तुमसे प्यार करता...
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गिरीश बिल्लोरे
प्रेम कविता
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[22 Mar 2010 17:12 PM]



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