कॉलर को थोड़ा ऊपर चढ़ा के ....सिगरेट के धुएं का छल्ला बनाके
कौन कहता है मर चुकी कविता ? कभी-कभी उसकी साँसों की आवाज़ सन्नाटे में गूंजती है अब भी ये गीत बनकर । कविता माने पोयट्री ज़िन्दा है बॉस ! न मानो तो लो सुन लो ये ग़ज़ल .............. आभार-- टी.सीरीज़...
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मुनीश ( munish )
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[22 Mar 2010 15:23 PM]



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