जो बचेगा कैसे रचेगा!

जनपद रचने को यानी सृजन को इस तरह भी देख सकते हैं कि अपना "सबकुछ" देकर ही कुछ रचा या सिरजा जा सकता है। कवि त्रिलोचन कहा करते थे कि कविता समूची जिंदगी मांगती है। वैसे भी प्रकृति को देखिए तो पाएंगे कि पतझर में अपना सर्वस्व दे चुकने के बाद वृक्ष हरियाली का नया... [पूरी पोस्ट]
writer अरविन्द चतुर्वेद
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[22 Mar 2010 12:29 PM]

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