भुतहा मकान के बाहर : मुक्तिबोध के लिए - हरि मौर्य
यह मेरे पिता की कविता है, कमाल की बात ये कि इसे उन्होंने 63 वर्ष की उम्र में लिखा है। उनके अतीत में बहुत पीछे 1962-63 के ज़माने में यानी उनके छात्रजीवन में कभी कहीं कुछ कविताएं थीं और भाऊ समर्थ,रामेश्वर शर्मा, नागार्जुन आदि से उनपर मिली ख़ूब प्रशंसा भी।...
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शिरीष कुमार मौर्य
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[22 Mar 2010 12:27 PM]



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