हादसा
रोज होते है,हादसे.शहर में,चोराहो पर, सड़क पर.हो जाता है भयावह माहोल वहां पर.होती है चीख-पुकार हर तरफ.हम भी देखते हैं अक्सर ये मंजर.और चल देते हैं,'बहुत बुरा हुआ ' कहकर .क्योकि हमे है जल्दी अपनी मंजिल पर पहुचने की.हमे नहीं है फुरसत वहां पर मदद करने की.नहीं...
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अंकुर कुमार 'अश्क'
कविता
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[22 Mar 2010 07:23 AM]



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