इस बरस

जो देखा भूलने से पहले जब हम बीच में होते हैं तो किनारों पे चली जाती हैं दूरियाँ,पास आकर भी भूल जाता हूँ निकटता की बेचैनीकिनारों पर टहलते हुए.इस बरस कैद कर लिया पाताल की देवी ने बसंत,फूटते हैं बर्फीले ज्वालामुखीकुछ और दरारें चटखती सतहों मेंगिरे हुए मलबों में अपना घर खोजते... [पूरी पोस्ट]
writer मोहन राणा - Mohan Rana
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[22 Mar 2010 06:57 AM]

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