बाज़ार : एक

कस्बे का कवि... पैर नहीं थकतेआँखें थक जाती हैंइस बाज़ार मेंबच्चे की तरह उँगली पकड़करसाथ चलते हैं सपनेऔर फिर गुम जाते हैंरंग-बिरंगी खुश्बूदार भीड़ मेंमैं सपने तलाशता हूँइस बाज़ार मेंऔर फिर-पैर भी थक जाते हैं.... [पूरी पोस्ट]
writer मणिमोहन
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[22 Mar 2010 03:12 AM]

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