यो हो हो हो
बहुत देर तक वह उस अधलिखी कविता को ताकती रही. कब और कैसे जीवन इस ओर घूम गया, इस बात का अफ़सोस नहीं होने का अफ़सोस उसे खाये जा रहा था. अब अपना चेहरा भी अनजाना सा लगता है.आईने के अंदर की औरत मैं हूँ -का विश्वास शीशे की तरह टूट गया लगता है. अंदर से मुझे घूर...
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विकास कुमार
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[21 Mar 2010 16:38 PM]



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