सृजनोत्सव: जनसंघर्ष और प्रतिरोध के संस्कृतिकर्म को राष्ट्रीय मंच देने की पहल

समकालीन जनमत सो रहा संसार, पूंजी का विकट भ्रमजालकिन्तु फिर भी सर्जना के एक छोटे से नगर में/ जागता है एक नुक्कड़चिटकती चिंगारियां/ उठता धुंआ है/ सुलगता है एक लक्कड़तिलमिलाते लोग सुनकर, देखकर अन्याय और लड़ने का अब भी बनाते मन मछन्दर फिर नए संघर्ष का उन्वान लेकर/ जाग मेरे... [पूरी पोस्ट]
writer समकालीन जनमत
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[21 Mar 2010 10:33 AM]

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