मेरी कूची व कलम से
जन्म होने की खुशीऔर मौत का रंजये तो दस्तूर है पुरानामुक्त होगे कब हमइन आदतो और इच्छाओसे जकडे पिंजरो की जंजीरो सेआजादी की डोर है पास अपनेफिर भी बन अंजान यूहीकब तक ढोयेगे इन जंजीरो कोहुआ है मुश्किल हाय क्या करे !निकलता है जब गम नयासुख भी जाता है छिपबादल की...
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anjana
कविता
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[21 Mar 2010 04:03 AM]



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