आह भी भरने नहीं देता
कसकते हैं मगर इक आह भी भरने नहीं देता ज़माना घाव को भी घाव अब कहने नहीं देता महत्वाकांक्षाएं तो खड़ी हैं पंख फैलाए बिछाकर जाल बैठा जग...
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chandrabhan bhardwaj
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[21 Mar 2010 01:59 AM]



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