चवन्नी और अठन्नी

काव्य कलश आज कलजहाँ देखो वहाँकई मितव्ययी दांतपराई अठन्नी को भीइतनी जोर से दबाते हैंकिबेचारी अठन्नीदबती - दबती चवन्नी बन जातीजब भीवह खोटी चवन्नी निकलतीइतनी तेज गति से निकलतीकि उन कंजूस सेठों का जबड़ा हीबाहर निकल जाताऔरइस एक ही झटके में शरीर कीनस नस की बरसों... [पूरी पोस्ट]
writer amritwani.com

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[20 Mar 2010 22:38 PM]

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