सूरज से ठनी है मेरी
एकबहुत मासूम-से चहरे बहुत-से घर बनाता हूंमैं इक संसार सपनों का मेरे अंदर बनाता हूंकहो मत शब्द इनको ये मेरी वो भावनाएं हैमैं जिनकी हू-ब-हू तस्वीर कागज़ पर बनाता हूंबदन में शब को दिन भर की थकन जब चुभने लगती हैसंजो कर कल्पनाएं नर्म-सा बिस्तर बनाता हूंसुकून...
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पुरु मालव
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[18 Mar 2010 05:34 AM]



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