गौरैय्या दिवस के अवसर पर-------
उड़ते फ़िरते पक्षी सारे ज्यों घूमा करते बंजारे घूम घूम कर डाली डाली ढूंढ़ रहे अपने घर सारे। प्रेम की भाषा इनमें इतनी काश कि इन्सानों में दिखती इनमें आपस में विश्वास बड़ा तभी तो रहते घर को संवारे। देख रहे सूनी आंखों से अपने संवरे घर को उजड़ते सोच रहे मन...
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JHAROKHA
कविता
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[20 Mar 2010 08:59 AM]



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