"पिंजरा"
द्वार खुला कबसे, पिंजरे का ,पंछी, फिर भी बैठा है,उड़ जा उड़ जा,वक्त यही है,पल पल खुद से कहता है, लाख जतन कर भी, उड़ने की,हिम्मत जुटा न पाता है,पंख भी हैं और मौक़ा भी फिर भी उड़ ना पाता है,है ऐसा क्या, जो रोके रास्ता,कैद से मुक्ति पाने का,प्रेम है ये...
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Yogesh Sharma
"पिंजरा"
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[20 Mar 2010 08:31 AM]



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