लव, सेक्स और धोखा
फिल्म समीक्षा सच की गली में ‘लव, सेक्स और धोखा‘धीरेन्द्र अस्थानाआम तौर पर साहित्य आम जनता के लिए नहीं होता। वह जनता के बारे में हो सकता है। लेकिन सिनेमा के लिए यह सिद्धांत आम तौर पर स्वीकृत नहीं है। माना जाता है कि सिनेमा आम दर्शक के मनोरंजन के लिए बनता...
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dhirendra asthana
राष्ट्रीय सहारा
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[20 Mar 2010 06:58 AM]



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