एक सिक्का
रोड पर बैठे हुए,हाथ में खाली कटोराबन दया का पात्र जग में,वह धूप में बैठा हुआ था.रास्ते पर चहल कदमी,कम नहीं तो अधिक भी ना.मई की उस तीक्ष्ण गर्मी में, था मैंने उसको देखा.देख कर पहली नज़र में,आदमी कहना कठिन था.बना ढाचा अस्थिओं का,मार्गिओं को देखता वह.लोग...
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राहुल पंडित
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[20 Mar 2010 01:59 AM]



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