थोड़ा और उन्मुक्त
जीवन यात्रा के मध्यान्ह में,एक दिन यूं ही बैठा था मै,सोचता हुआ मन ही मन,मूंद कर आखों की पलकें कुछ क्षण,एक बार वापस जाऊं बचपन में,फिर वो सब करूं जो किया था मैने,वो भी करूं जो नहीं किया,जो किया उसे उसी तरह से,या किसी और तरह से,जो नहीं किया डर के मारे,उसे...
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विजय प्रकाश सिंह
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[20 Mar 2010 01:20 AM]



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