ये क्या किया

धड़कन मेरी वफा को तार तार किया तुमने क्या रंग इख़्तियार किया कितना अजीम है वो शख्स हमे हमने जिसपे था जांनिसार किया अब तुझसे क्या कहे ऐ दोस्त तेरी आरजू ने हमे बेजार किया नफरत कि जो आग है दिलो में उसने खुद हमे शर्मशार किया तलबगार है फूलो के बहुत मगर काँटों से खुद... [पूरी पोस्ट]
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[25 Feb 2010 01:51 AM]

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