हमपे करम बहुत हैं उस सितमगार के
ऐ मेरे सनम तेरी महोब्बत में हार के यूँ ही चले जाएगे शबे गम गुजार के है मयकदा वीरान और सागर उदास है जाने से उनके रूठ गए दिन बहार के हम टूट भले जाएँगे शिकवा न करेंगे हमपे करम बहुत हैं उस सितमगार के ख्वाबो के ही आलम में आजाये वो कभी पलकों में पालती रही दिन...
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[02 Mar 2010 11:18 AM]



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