याद न जाये, बीते दिनों की...

अपनी बात... कैसी भाग-दौड़ की ज़िन्दगी हो गई है.....|घड़ी के साथ उठना, घड़ी के साथ सोना, घड़ी के साथ आना- घड़ी के साथ जाना........|इंसान न हुआ, घड़ी हो गया। घूमता रहता है, काँटों की तरह। हर वक्त " समय ही नहीं मिलता...", "फुरसत ही नहीं है...." जैसे जुमले मुंह पर सवार रहते... [पूरी पोस्ट]
writer वन्दना अवस्थी दुबे

संस्मरण

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[14 Dec 2009 07:45 AM]

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