नवगीत : चूहा झाँक रहा हंडी में... --संजीव 'सलिल'
*चूहा झाँक रहा हंडी में,लेकिन पाई सिर्फ हताशा...*मेहनतकश के हाथ हमेशारहते हैं क्यों खाली-खाली?मोती तोंदों के महलों में-क्यों बसंत लाता खुशहाली?ऊँची कुर्सीवाले पातेअपने मुँह में सदा बताशा.चूहा झाँक रहा हंडी में,लेकिन पाई सिर्फ हताशा...*भरी तिजोरी फिर भी...
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आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
samyik hindi kavita
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[19 Mar 2010 12:57 PM]



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