कह दिया मैंने ..

सच्चा शरणम् मेरी अपनी एक ज़िद हैरहने की, कहने की और उस ज़िद का एक फलसफ़ा ।यूँ तो दर्पण टूट ही जाता हैपर आकृति तो नहीं टूटती न !उसने मेज पर बैठी मक्खी कोमार डाला कलम की नोंक सेक्या मानूँ इसे ?विगत अतीत में दलित हिंसा की जीर्ण वासना काआकस्मिक विस्फोट... [पूरी पोस्ट]
writer हिमांशु । Himanshu

कविता

views
41
upvote
4
downvote
0
rating
4
comments
25
[18 Mar 2010 21:29 PM]

Free Vedic Astrology From Astrobix