नाकाम मोहब्बत
परिन्दे भी अब इस शहर से रवाना हो चले ।कि इस शहर के पेड़ो पर अब शाखे नहीं रही ॥जो तुमको देख कर जी बहला लेते थे कभी,इस चेहरे पर अब वो निगाहें नहीं रही ॥आज हर तरफ़ हैं अन्धेरा अपनी बाहें फैलाये हुए,राह दिखलाती जो, वो रोशनी की किरणे नहीं रही ॥छोड़ कर चल देना...
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dipayan
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[18 Mar 2010 13:49 PM]



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