जनाब "सरवर" की दो गज़लें
ग़ज़ल : खेल इक बन गया ज़माने का ...... खेल इक बन गया ज़माने का तज़करा मेरे आने जाने का ज़िन्दगी ले रही है हमसे हिसाब क़तरे क़तरे का ,दाने दाने का क्या बताए वो हाल-ए-दिल अपना "जिस के दिल में हो ग़म ज़माने का" हम इधर बे-नियाज़-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ शौक़ उधर तुम को आज़माने का...
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आनन्द पाठक
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[18 Mar 2010 11:55 AM]



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