चेतक की समाधि से -4
भाग-१ , भाग-२,भाग-३ से आगे..........." वातावरण की एकरूपता में इतना समय हो गया कि मुझ अभागे को ध्यान ही नहीं रहा, कि वे तो मुगलों से घिर गए | इतने में मैंने झाला सरदार को देखा | घेरे को तोड़ कर वे समीप आ गए और उन्होंने उनका मुकुट अपने सिर पर धारण कर लिया |...
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क्षत्रिय
स्व.श्री तन सिंह जी कलम से
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[18 Mar 2010 10:58 AM]



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