मेरे गावं की कहानी : एक
अरविन्द चतुर्वेद समय की अपनी फिक्र होती है जो हर आदमी के चेहरे पर लकीरें खींचती रहती है। उसके विशाल परदे पर पुराने दृश्य ओझल होते हुए गायब होते जाते हैं और उनकी जगह नए दृश्य, नए चित्र उभरते हैं। क्या यह रूप-परिवर्तन ही समय-परिवर्तन है? नहर किनारे बसे इस...
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अरविन्द चतुर्वेद
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[18 Mar 2010 11:01 AM]



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