कल, आज और कल - 1
रामकुमार कृषक कवितान छल होता न प्रपंचन स्वार्थ होता न मंचन चादर होती न दाग़न फूस होता न आगन प्राण होते न प्रणन देह होती न व्रणन दुष्ट होते न नेकन अलग होते न एकन शहर होते न गाँवन धूप होती न छाँवअगर हम जानवर होते===================रघुवीर सहाय...
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Rajey Sha
कविता kavita
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[18 Mar 2010 09:30 AM]



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