‘‘मेरा बस्ता कितना भारी’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

नन्हें सुमन मेरा बस्ता कितना भारी।बोझ उठाना है लाचारी।।मेरा तो नन्हा सा मन है।छोटी बुद्धि दुर्बल तन है।।पढ़नी पड़ती सारी पुस्तक।थक जाता है मेरा मस्तक।।रोज-रोज विद्यालय जाना।बड़ा कठिन है भार उठाना।।कम्प्यूटर का युग अब आया।इसमें सारा ज्ञान समाया।।मोटी पोथी सभी हटा... [पूरी पोस्ट]
writer डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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[18 Mar 2010 07:37 AM]

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