सत्तू
.....मैं अपने आप से , बार -बार पूछने लगा ,जो कुछ मैं कर रहा हूँइसका अंजाम क्या होगा ?........क्या मैं गुनाह की चादर ओढ़ रहा हूँ ?इसी उधेड़ -बुन में बैठा रहा ........कुछ सोच के, नोट जो अभी निकाले थे ,दुबारा उसी झोले में रख दिया ......और आँखे बंद कर के सोने...
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भंगार
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[18 Mar 2010 03:44 AM]



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