स्त्रियां
पढ़ा गया हमें जैसे पढ़ा जाता है कागजबच्चों की फटी कापियों का चनाजोर गरम के लिफाफे बनाने के पहले!देखा गया हमको जैसे कुफ्त हो उनींदे देखी जाती है कलाई घड़ीअलसुबह अलार्म बजने के बाद!सुना गया हमको यों ही उड़ते मन से जैसे सुने जाते हैं फिल्मी गानेसस्ते...
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संदीप पाण्डेय
कविता
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[18 Mar 2010 02:13 AM]



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