बादल का टुकड़ा निचोड़ कर.
दॄष्टि तुम्हारी चूम गई थी आकर जहाँ नयन को मेरेयह पागल मन अब भी अटका हुआ उम्र के उसी मोड़ परताजमहल की परछाईं में बतियाता था मैं लहरों सेअधलेटा, सर टिका हथेली पे अपनी मैं अलसाया सागंध भरे बादल का टुकड़ा आया एक पास था मेरेजैसे गीत हवा का गाया मौसम ने हो...
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राकेश खंडेलवाल
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[17 Mar 2010 22:13 PM]



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