माला तो माया की, पर मालामाल कौन नहीं?
वाकई माला के अनेकों रूप। भगवान के गले में डाल दो, तो धर्म। शादी में दूल्हा-दुल्हन एक-दूसरे को पहनाएं, तो वरमाला। वर्कर अपने नेताओं को पहनाएं, तो आप ही तय करो। यह स्वागत या चमचागिरी? नेताओं के प्रति किसकी कितनी श्रद्धा, यह तो महानुभाव खुद ही जानते। फिर भी...
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[17 Mar 2010 12:43 PM]



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