सत्तू

मेरी कहानियां करीब दो बजे ,आँख खुली ...भूख लग रही थी । इस झोपड़ी में एक बड़ासा ड्रम था ,जिसमें बिरजू सुबह उठ कर पानी भर देता था ,मैंने पहलेनहाया और फिर चाय पीने के लिए ,घर से निकला ,बगल की गली मेंएक चाय की दूकान थी ,वहीं अक्सर चाय पीता हूँ, यह दूकान एक औरतचलाती है... [पूरी पोस्ट]
writer भंगार
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[17 Mar 2010 03:35 AM]

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