हत्यारे
(एक)हत्याराअब नहीं रहारात के अंधेरों का मुहताजमुक्त अर्थव्यवस्था केपंचसितारा सैलून मेंसजसंवर करनिःसंकोच घूमता हैन्याय की दुकानो सेसत्ता के गलियारों तकनये चलन के बरअक्सपहन लिए हैंत्रिषूल के लाॅकेटऔरअपने हर शिकार को कहता हैआतंकवादी!(दो)टूटते परिवारों केइस...
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अशोक कुमार पाण्डेय
सात साल पुरानी कविता
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[17 Mar 2010 01:05 AM]



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