हत्यारे

असुविधा (एक)हत्याराअब नहीं रहारात के अंधेरों का मुहताजमुक्त अर्थव्यवस्था केपंचसितारा सैलून मेंसजसंवर करनिःसंकोच घूमता हैन्याय की दुकानो सेसत्ता के गलियारों तकनये चलन के बरअक्सपहन लिए हैंत्रिषूल के लाॅकेटऔरअपने हर शिकार को कहता हैआतंकवादी!(दो)टूटते परिवारों केइस... [पूरी पोस्ट]
writer अशोक कुमार पाण्डेय

सात साल पुरानी कविता

views
22
upvote
2
downvote
1
rating
1
comments
9
[17 Mar 2010 01:05 AM]

Free Vedic Astrology From Astrobix