इलास्टिक व एक अन्य कविता
पुनीत की दो कविताएं इलास्टिक व घूम रहा है अब भी:उनका परिचय मेरे ब्लाग पर यहां पढ़ेंहोते है कई तरह केरिश्तो के बंधनकुछ सूत से कच्चेज़रा सी हरकत , टूट गएकुछ लोहे से मज़बूतजोर लगाओ , पंख पसारोफर्क नहीं कुछ पड़ता हैहमारा रिश्ताबंधन है इलास्टिक काअब न जाने...
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संदीप पाण्डेय
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[17 Mar 2010 01:04 AM]



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