गज़ल
रखते नहीं हैं बैर किसी आदमी से हम,फिर भी हैं अपने शहर में एक अजनवी से हम,देखा हैं जलते जबसे गरीबों का आशियाँ, डरते हैं हर चिराग की अब रोशनी से हम, हम बोलते नहीं हैं तो समझे न बेजुबां है, अपने घर की बात, कहें क्यों किसी से हम, तेरी ख़ुशी का आज भी इतना...
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अंकुर कुमार 'अश्क'
गज़ल
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[29 Oct 2009 10:11 AM]



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