सुबह तक

गुलमोहर का फूल मुझे पसंद नहीं सूरज का डूबना । न जाने कौन सी एक आग अन्दर हीं अन्दर जलती रहती है । कण- कण पिघलता जाता हूँ सुबह तक कहाँ बच पता हूँ । ... [पूरी पोस्ट]
writer चंदन कुमार झा

poetry

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[16 Mar 2010 14:40 PM]

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