गम है कि जिन्दा हूँ, वरना खुशियों से तो मर जाता

जीवन के पदचिन्ह गम है कि जिन्दा हूँ, वरना खुशियों से तो मर जातातनहाइयों ने थामे रखा, वरना जमाने में किधर जाता सौ बार हुआ क़त्ल रहा फिर भी धड़कता मेरा दिलमाजी की थी चाहत नहीं तो इक झोके से बिखर जाता न छिपा ज़ालिम पर्दों में यूँ, इस गुल-ए-हुस्न को अपने होती... [पूरी पोस्ट]
writer Sudhir (सुधीर)

मैं

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[16 Mar 2010 14:00 PM]

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