ग़ज़ल

Ismat Zaidi ग़ज़ल-_____________________चला भी जाऊं तो तुम इंतेज़ार मत करनाऔर अपनी आंख कभी अश्कबार मत करनाउलझ न जाए कहीं दोस्त आज़माइश मेंकि ख़्वाहिशें कभी तुम बेशुमार मत करनामैं जानता हूं कि तख़रीब है तेरी आदतहरे हैं खेत इन्हें रेगज़ार मत करनामेरी हलाल की रोज़ी... [पूरी पोस्ट]
writer इस्मत ज़ैदी
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[15 Mar 2010 15:16 PM]

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