ये नहीं है मेरी बरेली........

साहित्य योग ये नहीं है मेरी बरेलीजहाँ हाथ में धर्मं का है छूरामन में अंधविश्वास की छायाआदमी-आदमी को मार रहाना कोई मोह ना कोई मायामानवता के हो गए टुकड़े टुकड़ेहर टुकड़े पर घाव बेसुमारजल रहे हैं घर एक-एक कर के  सपने थे जिसमें दस हजारफफक-फफक कर रो रहा  वह मंदिर... [पूरी पोस्ट]
writer Tej Pratap Singh
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[15 Mar 2010 15:09 PM]

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