एक था पेड़

उधेड़-बुन एक था पेड़जो लहलहाता था आंगन मेंअब जल रहा हैमेरे फ़ायर-प्लेस मेंएक था पशुजो विचरता था बाग मेंअब पक रहा हैमेरे किचन मेंएक थे पूर्वजजिनकी अस्थियाँबन के जीवाश्म ईधनजल रही हैंमेरी कार मेंऊर्जान बनती हैन मिटती हैसूत्र यही सोच करकरता हूँ मन शांत मैंसिएटल ।... [पूरी पोस्ट]
writer Rahul Upadhyaya

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[15 Mar 2010 15:05 PM]

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