हसरत-ए-मंजिल

बावरा मन हसरत-ए-मंजिलन मैं बदला न तुम बदली न ही बदलीहसरत-ए-मंजिलफिर क्यूं कहते हैं सभीकि बदला सा सब नज़र आता हैशमा छुपा देती हैशब-ए-गम केअंधियारे कोवो समझते हैंकि हम चिरागों के नशेमन में जिया करते हैं .................. [पूरी पोस्ट]
writer सुमन'मीत'

कुछ कतरे जिन्दगी के

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[15 Mar 2010 14:26 PM]

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